शासकीय जमीन पर लगा जिओ का टावर, निजी व्यक्ति वसूल रहा था किराया , तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद सामने आई गड़बड़ी, राजस्व विभाग ने शुरू की वसूली की कार्रवाई

ग्राम पहंडोर का मामला, ग्रामीण युवक भावेश की शिकायत पर हुई जांच

पाटन। ग्राम पहंडोर में शासकीय भूमि पर मोबाइल कंपनी का टावर लगाए जाने और उसका किराया गांव के ही एक व्यक्ति द्वारा वसूल किए जाने का मामला सामने आया है। ग्रामीण युवक भावेश द्वारा करीब तीन वर्षों तक तहसीलदार से लेकर कलेक्टर तक शिकायत और कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद राजस्व विभाग की जांच में मामले में गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं। अब राजस्व विभाग द्वारा संबंधित व्यक्ति से शासन के नियमानुसार राशि की वसूली की कार्रवाई की जा रही है।

मामला ग्राम पहंडोर में जिओ कंपनी द्वारा लगाए गए मोबाइल टावर से जुड़ा है। उपलब्ध राजस्व आदेश के अनुसार, टावर लगाने के लिए खसरा नंबर 40 की भूमि का दस्तावेज प्रस्तुत कर आवेदन किया गया था। बाद में अभिलेखों एवं स्थल निरीक्षण में यह तथ्य सामने आया कि टावर वास्तव में खसरा नंबर 701 की भूमि पर स्थापित है। इसके बाद राजस्व विभाग ने भूमि के स्वामित्व और टावर स्थापना की पूरी प्रक्रिया की जांच के निर्देश दिए थे।

हर माह खाते में पहुंच रही थी किराए की राशि

शिकायत के अनुसार, जिओ कंपनी द्वारा टावर का किराया गांव के ही खोमलाल वर्मा के बैंक खाते में हर माह जमा किया जा रहा था। राजस्व अधिकारी के आदेश में उल्लेख है कि शासकीय भूमि पर टावर के एवज में खोमलाल वर्मा द्वारा कंपनी से प्रतिमाह 3 हजार रुपये किराया प्राप्त किया जा रहा था, जिसे राजस्व विभाग ने अवैधानिक बताते हुए नियमानुसार वसूली की कार्रवाई शुरू किए हैं।

भावेश ने तीन साल तक लड़ी लड़ाई

ग्रामीण युवक भावेश ने इस मामले को लेकर लंबे समय तक अधिकारियों के समक्ष शिकायतें कीं। तहसीलदार से लेकर कलेक्टर स्तर तक मामला पहुंचने के बाद अंततः राजस्व विभाग ने अभिलेखों की जांच और स्थल निरीक्षण कराया। जांच के बाद अब मामले में कार्रवाई आगे बढ़ी है।

निजी जमीन का दस्तावेज देकर टावर लगाने का आरोप, अब इसकी भी जांच जरूरी

इस पूरे मामले में एक और बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। जानकारी के मुताबिक टावर जिस भूमि पर स्थापित है, वह शासकीय भूमि बताई जा रही है, जबकि टावर स्थापना की प्रक्रिया में निजी भूमि से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। ऐसे में यह जांच का विषय है कि आखिर शासकीय भूमि पर टावर स्थापित होने के बावजूद निजी भूमि के दस्तावेज किस आधार पर प्रस्तुत किए गए और उनका उपयोग किसने किया।

ग्रामीणों का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दस्तावेज प्रस्तुत करने से लेकर टावर की अनुमति और किराया भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। साथ ही तत्कालीन पंचायत जनप्रतिनिधियों की भूमिका की भी जांच किए जाने की मांग उठ रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शासकीय भूमि पर टावर लगाने की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर किसकी भूमिका रही।

अब सवाल यह है कि शासकीय जमीन पर वर्षों से निजी व्यक्ति को किराया क्यों मिलता रहा और संबंधित विभागों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? भावेश की लंबी लड़ाई के बाद मामला सामने आने से अब जिम्मेदार लोगों की भूमिका और शासन को हुए आर्थिक नुकसान की जांच पर निगाहें टिकी हैं।