शैलदेवी महाविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा, विज्ञान एवं वेदान्त का संवाद” पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर पूज्यपद अनन्त श्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के पावन सानिध्य में

अंडा। शैलदेवी महाविद्यालय, अंडा द्वारा दिनांक 29 से 31 जनवरी 2026 तक “भारतीय ज्ञान परंपरा: विज्ञान और वेदान्त का संवाद” विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का अत्यंत गरिमामय, वैचारिक एवं ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ।
प्रथम दिवस: संगोष्ठी विषय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए विद्वान वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंध पर व्यापक विमर्श प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि डॉ. भूपेंद्र कुलदीप, कुलसचिव, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग ने मां शारदा को नमन करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी विज्ञान और वेदान्त के मध्य सेतु स्थापित करने का दुर्लभ अवसर है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के संदर्भ में कहा कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली प्राचीन वैदिक ज्ञान, श्रुति–स्मृति, इतिहास, पुराण एवं गुरुकुल परंपरा से कटती जा रही है, जिसके कारण नई पीढ़ी अपने मूल से विमुख हो रही है। वैदिक गणित, ज्यामिति, भौतिकी, रसायन, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा, विमान शास्त्र जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना आज की आवश्यकता है।


अतिथि संयोजक एवम् मुख्य वक्ता डॉ. संदीप अवस्थी ने प्रथम व द्वितीय दिवस संगोष्ठी के दौरान अपने शोध परक, तथ्यात्मक एवं वैचारिक वक्तव्यों से विषय की प्रासंगिकता को और अधिक सुदृढ़ किया तथा सभी सत्रों का कुशल संचालन करते हुए सनातन चेतना, भक्ति विज्ञान और जीवन दर्शन को रेखांकित किया।
विशेष आमंत्रित वक्ता डॉ. अंजलि अवधिया, प्राचार्य, शासकीय कमलादेवी राठी महाविद्यालय, राजनांदगांव ने “भारतीय ज्ञान परंपरा: विज्ञान और वेदान्त का संवाद” विषय पर क्वांटम फिजिक्स के संदर्भ में षड्दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा कि क्वांटम भौतिकी प्रकृति को समझने का आधुनिक माध्यम है, जबकि भारतीय दर्शन उसी सत्य को अनुभव के स्तर पर प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त ज्ञान ही परंपरा है और आत्मबल से ही समस्त बल उत्पन्न होती हैं। भारत को समझने के लिए भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा को समझना अनिवार्य है।
द्वितीय दिवस : शास्त्रसम्मत समाधान और शिक्षा पर पुनर्मूल्यांकन पर आधारित रहा जिसमें प्रथम एवं द्वितीय दोनों सत्र में पूज्य शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने अपनी ओजस्वी वाणी में कहा कि सनातन धर्म और भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय है। उन्होंने ज्ञान–विज्ञान, परंपरा, शिक्षा, संस्कार, ब्रह्म तत्व, जीव–ईश्वर संबंध जैसे गूढ़ विषयों पर उपस्थित जनसमुदाय के प्रश्नों के शास्त्रसम्मत समाधान प्रस्तुत किए।
महाराज श्री के परम शिष्य श्री ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी ने लॉर्ड मैकाले द्वारा लागू शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हुए कहा कि यह भारतीयता के लिए घातक सिद्ध हो रही है। भारत को पुनः भारत बनाने के लिए प्राचीन शास्त्रसम्मत शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करना अनिवार्य है।
विशिष्ट वक्ता प्रो. अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी, कुलपति, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर ने कहा कि भारतीय शिक्षा प्रणाली विश्व की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और मूल्याधारित प्रणाली रही है। यदि आधुनिक शिक्षा में प्राचीन ज्ञान परंपरा और संस्कारों का समन्वय किया जाए, तो भारत पुनः विश्व गुरु बन सकता है।
समापन दिवस का शुभारंभ छत्तीसगढ़ की लोक–संस्कृति पर आधारित ‘जय जोहार’ नृत्य से हुआ।
पूज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज ने वाराणसी के महत्व, भक्ति विज्ञान, ब्रह्म के भेद, गीता प्रमाण, भोजन विज्ञान, तीर्थ महत्व, मोक्ष के उपाय, पंचमहाभूत, दान धर्म एवं युवाओं के चरित्र निर्माण पर अत्यंत व्यापक और शास्त्रीय विवेचन प्रस्तुत करते हुए और सभा में उपस्थित विद्यार्थियों, शोधार्थियों और जन समुदाय द्वारा प्रस्तुत शंकाओं का सारगर्भित और शास्त्र सम्मत समाधान प्रदान किए।
ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी महाराज ने पंचतत्व, पंचमहाभूत, चारों वाणियों, गुरु–शिष्य परंपरा और ब्रह्म स्वरूप को वैदिक प्रमाणों सहित स्पष्ट किया।
डॉ. ओंकार लाल श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष, गणित, शासकीय कमलादेवी राठी महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव ने कहा कि तार्किक चिंतन और व्यवहारिक ज्ञान से मानव जीवन के अनेक सूत्र सुलझते हैं। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने वेदों में वर्णित गणितीय एवं वैज्ञानिक सूत्रों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए सरल ढंग से प्रस्तुत करते हुए वेदों में वर्णित गणित, आयुर्वेद, वनस्पति विज्ञान एवं धातु शास्त्र की वैज्ञानिकता को रेखांकित किया।


संगोष्ठी में होलेश्वर देशमुख, डॉ. मंजू साहू, जयति साहू, श्यामसुंदर पटनायक, रश्मि ताम्रकार सहित अनेक शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
राजन कुमार दुबे चेयरमैन शैलदेवी महाविद्यालय द्वारा मुख्य अतिथि व आमंत्रित वक्ताओं को प्रतीक चिन्ह भेंट किया गया। इस प्रकार यह त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण, विज्ञान–वेदान्त संवाद और सांस्कृतिक चेतना के दृष्टिकोण से अत्यंत प्रेरणास्पद, विचारोत्तेजक एवं ऐतिहासिक सिद्ध हुआ।