श्रेष्ठ भक्ति से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव,ओटेबंद में भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर श्रीकृष्ण जन्म व लीला का भावपूर्ण वर्णन

अंडा।  ग्राम ओटेबंद  बगिचा में चल रहे श्री विष्णु महायज्ञ के अंतर्गत आयोजित श्रीमद् भागवत पुराण कथा के षष्ठम दिवस पर श्रीधाम वृंदावन से पधारे पूज्य संत श्री राजीव नयन जी महाराज ने श्रीकृष्ण जन्म एवं उनकी दिव्य लीलाओं का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण हेतु हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
महाराज श्री ने कहा कि “भगवान खट्टे-मीठे भोग के भूखे नहीं, वे तो केवल प्रेम के भूखे हैं।” जो सम्पूर्ण विश्व का पालन-पोषण करते हैं, वे भक्तों के प्रेम और निष्कपट भाव से ही प्रसन्न होते हैं। प्रभु को पाने के लिए गोपियों जैसी व्याकुल भक्ति और समर्पण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बिना गुरु के नाम, पद, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। बाह्य शिक्षा तो सभी पा लेते हैं, किंतु यदि ज्ञान भक्ति में परिवर्तित नहीं होता तो वह अहंकार का कारण बन जाता है।
भागवत कथा में परीक्षित के रूप में बैठे देवरी निवासी शेरसिंह देशमुख, तेजिया बाई देशमुख बैठे हैं।
षष्ठम दिवस पर संत श्री ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अद्भुत प्रसंग सुनाया। कंस के अत्याचार, कारागार में देवकी-वासुदेव की पीड़ा तथा मध्यरात्रि में अवतरित हुए भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा पंडाल में “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोष गूंज उठे।


संत श्री ने मैय्या यशोदा और बाल गोपाल की लीलाओं का सजीव चित्रण करते हुए माता-पिता के प्रति संतानों के कर्तव्य का बोध कराया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक पुत्र को श्रीराम और श्रीकृष्ण की भांति आज्ञाकारी होना चाहिए। वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज माता-पिता मिलकर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, लेकिन बड़े होने पर वही संतान सेवा से विमुख हो जाती है, जो गंभीर पाप का कारण है।
उन्होंने आगे कहा कि श्रीकृष्ण नाम स्वयं में एक मंत्र है। गीता जीवन का सार है और यदि किसी ने श्रीकृष्ण को समझ लिया तो उसने परमात्मा को समझ लिया।
कथा के अंत में कंस वध के उपरांत देवकी-वासुदेव की मुक्ति तथा रुक्मिणी-कृष्ण विवाह की मनोहारी झांकी प्रस्तुत की गई, जिसने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। झांकी के दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय उल्लास से झूम उठा।
षष्ठम दिवस की कथा ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि श्रेष्ठ भक्ति, प्रेम और समर्पण से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव है।