पाटन। सरकार के सुशासन के दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। दुर्ग जिले में विकास की रीढ़ माने जाने वाले पंचायत सचिव और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आज खुद आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि अब यही मैदानी अमला सरकार के सुशासन शिविरों में अपनी फरियाद लेकर पहुंचने को मजबूर हो गया है।
जानकारी के अनुसार, जिले के करीब 300 ग्राम पंचायत सचिवों को पिछले दो महीनों से वेतन नहीं मिला है। वहीं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को भी पिछले महीने का मानदेय अब तक नहीं दिया गया। ऐसे में रोज जनता की समस्याएं हल करने वाले ये कर्मचारी खुद अपनी परेशानियों से घिरे हुए हैं।
सरकार जहां मई महीने में बड़े स्तर पर सुशासन शिविर आयोजित कर जनता की समस्याओं के समाधान का दावा कर रही है, वहीं जमीनी अमला अब इन्हीं शिविरों को अपनी आवाज बुलंद करने का मंच बनाने की तैयारी में है।
गौरतलब है कि पंचायत सचिव गांव-गांव में सरकारी योजनाओं को लागू करने और हितग्राहियों तक लाभ पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं, कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं दिन-रात मैदान में डटी रहती हैं। लेकिन विडंबना देखिए—जो व्यवस्था को संभाल रहे हैं, वही आज उपेक्षा का शिकार हैं।
वेतन न मिलने से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। शादी-ब्याह का सीजन होने के कारण खर्चे बढ़ गए हैं, लेकिन जेब खाली है। आर्थिक तंगी ने अब मानसिक तनाव का रूप ले लिया है।
अब सवाल यह है—
क्या सुशासन शिविर में सरकार अपने ही कर्मचारियों की सुन पाएगी?
या फिर यह आक्रोश आने वाले दिनों में किसी बड़े आंदोलन का रूप लेगा?







