पाठकों की पाती में आज विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष….शीतल साहू की कलम से पढ़ें ये कविता
वे है वे इस धरा पर सदियों सेजी रहे है प्रकृति के साथ वनों में फिरते और विचरते भूख और प्यास से जूझते अनगढ़ पत्थरों को गढ़ते और तराशते। कोदो.
वे है वे इस धरा पर सदियों सेजी रहे है प्रकृति के साथ वनों में फिरते और विचरते भूख और प्यास से जूझते अनगढ़ पत्थरों को गढ़ते और तराशते। कोदो.
माँ माँ मै तो तेरी ही रचना हूँ .. आज अपनी ही रचना पर क्या लिखूँ? हर पल हर दिन मेरे लिए खास हो माँ, एक अनकही सी कहानी हो.
बोरे-बासी —— कहिके गे हे हमर पुरखा घुरवा के दिन घलो बहुरथे सिरतोन हे उकर भाखा सौंहत आँखी मा जब वो दिखथे। फेर में तो हव इहि के माटी हरव.
राम धर्म मे राम कर्म में राम। दर्शन में राम वर्चन में राम। विचारों में राम संस्कारो में राम। विमर्श में राम उत्कर्ष में राम। साहित्य में राम लालित्य में.