छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य गेड़ी को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है ।लाल किले में 180 देश के प्रतिनिधियों ने मांदर की थाप पर बास की लाठी पर चढ़े कलाकारों को नृत्य करते देखा। गेड़ी की परंपरागत वेशभूषा में सजे प्रदेश के इन कलाकारों ने चार दिनों तक किले के अलग-अलग मंचों पर प्रस्तुति दी, जिसे देखकर देश-विदेश के लोग चौंक उठे ।दरअसल दिल्ली में यूनेस्को कन्वेंशन के तहत अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतर सरकारी समिति के 20वें सत्र का आयोजन किया गया। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम में अलग-अलग राज्यों के लोक नृत्य की प्रस्तुति हुई सर्वे के अनुसार छत्तीसगढ़ से गेड़ी नृत्य का चुनाव किया गया था इसके लिए लोक नृत्य भारतीय समिति के 12 कलाकारों को दिल्ली बुलाया गया था। समापन अवसर पर पंजाब, महाराष्ट्र असम और गुजरात के साथ छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने एक साथ प्रस्तुति दी ।वहीं से लौटकर समिति के मुख्य गायक नृत्य निर्देशक अनिल गढ़ेवाल ने बताया कि यूनेस्को महानिदेशक डॉक्टर खालिद एन एनानी ने गेड़ी नृत्य के बारे में जाना ।केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी गेड़ी चढ़ी वही तोषण साहू ने अपनी निवास बुलाकर कलाकार को सम्मानित किया।

आठवीं पीढ़ी जो आगे बढ़ा रही परंपरा
दल के प्रमुख अनिल गढ़ेवाल बताते हैं कि वे सभी सात पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं दिल्ली में उन्होंने कौड़ी- चीनी मिट्टी की माला, पटसन वस्त्र, शिकबंद मोर पंख पहना । इस दल में मोहन डोंगरे ,महेश नवरंग ,सोखी लाल कोसले, प्रभात बंजारे, लक्ष्मी नारायण माण्डले शुभम भार्गव ,सुरज खांडे ,शुभम भारद्वाज मनोज माण्डले फूलचंद ओगरे शामिल रहे।
प्राचीन ही नहीं, गेड़ी सरगुजा से बस्तर तक व्यापक, इसमें जाति समुदाय का बंधन नहीं
गेड़ी नृत्य पूरे छत्तीसगढ़ में व्यापक और प्राचीन है। छत्तीसगढ़ के एक छोर से दूसरे छोर यानी सरगुजा बस्तर तक सभी इलाकों में चली जाती है। नृत्य ही नहीं दौड़ प प्रतियोगिताएं भी होती है गेड़ी नृत्य छत्तीसगढ़ के धार्मिक पक्ष से भी जुड़ी है हरेली अमावस्या पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक गाड़ी चढ़कर परंपरा का निर्वाह किया जाता है। पहले के समय बारिश के दिनों में लोग जल भराव कीचड़ को पार करने सांप बिच्छुओं से बचकर चलने के लिए भी गेड़ी का उपयोग करते थे धीरे-धीरे लोक नृत्य का रूप ले लिया गया।







