पंडरिया क्षेत्र के वनों में आ पहुंचे मप्र के राजकीय पक्षी दूधराज, प्रजनन पश्चात लौटेंगे वापस

राजकुमार सिंह ठाकुर

पंडरिया । ब्लाक के वन क्षेत्र में मध्यप्रदेश का राजकीय पक्षी दूधराज सैकड़ो की संख्या में पहुंच चुके हैं।जो प्रजनन पश्चात पुनः मध्यप्रदेश लौट जाएंगे।ये पक्षी घने जंगलो,बगीचों,घनी झाड़ियों में रहते हैं।यह देखने में बहुत ही सुंदर व आकषर्क होता है।इसे सुल्ताना बुलबुल व एशियन पैराडाइज़ फ्लाईकैचर नाम से भी जाना जाता है।नगर से करीब 5 किलोमीटर दूर क्रांति जलाशय के आस-पास व जंगल के भितरी भागों में ये पक्षी बड़ी संख्या में पहुँचे हुए हैं।दूधराज पक्षी में नर पक्षी के लंबी पूंछ होती है।जिसकी लंबाई करीब 30 सेंटीमीटर तक होती है।मादा दूधराज की पूंछ छोटी होती है तथा लंबाई भी कम होती है। दूधराज नर पक्षी के दो रूप देखने को मिलते हैं।एक प्रकार के नर का रंग भूरे-केशरिया- लाल रंग का होता है,वहीं दूसरे प्रकार के नर सफेद-ग्रे रंग का होता है।बताया जाता है कि छोटे नर का रंग लाल-केशरिया होता है।जो युवा होने पर सफेद हो जाता है।यह परिवर्तन लंबे समय मे होता है।इस दौरान इसे आधा सफेद व आधा लाल -भूरा भी देखा जा सकता है।एक पक्षी का जीवन काल के दौरान रंग परिवर्तन आश्चर्यजनक है।इनका चोंच गहरा नीला व काला होता है तथा सर चमकीले काले व गहरे रंग का होता है।इसी प्रकार मादा दूधराज भूरे-लाल रंग का होता है तथा इसकी पूंछ की लंबाई छोटी होती है।यह पक्षी तेज आवाज करने वाला होता है।इसकी आवाज तीखी होती है।इनका प्रजनन काल मार्च के अंत से जुलाई तक होता है।इस दौरान ये अंडे देते हैं।एक बार में 3 से 5 अंडे देते हैं,जिसमे से करीब15से 20 दिन बाद चूजे निकलते हैं।इस बार ये पक्षी देर से क्षेत्र में पहुँचे हैं।पहले ये मार्च महीने तक यहां पहुंच जाते थे,किन्तु इस वर्ष अप्रेल के अंतिम व मई में दिखाई दे रहे हैं।वन विभाग पण्डरिया के एसडीओ जशवीर सिंह मरावी ने बताया कि मध्यप्रदेश के राजकीय पक्षी दूधराज बड़ी संख्या में क्षेत्र के जंगलों में पहुंचे हैं,जो प्रजनन के बाद वापस लौट जाते हैं।कुछ पक्षियों के घोसले तैयार हो चुके हैं,वहीं कुछ अभी घोसले तैयार करने में जुटे हुए हैं।

किट- पतंगे इनका मुख्य भोजन- फ्लाईकैचर दूधराज का मुख्य भोजन किट पतंगे हैं।ये किट-पतंगे,तितली,मख्खियां,सहित अन्य कीड़ो को खाते हैं।बच्चों को भोजन कराने का कार्य नर व मादा दोनों के द्वारा किया जाता है।इसका घोसला तिनकों व पेड़ों की छोटे-छोटे टहनियों से मिलकर बने होते हैं।जो एक कप के आकार के होते हैं।घोसला का प्रयोग दुबारा नहीं किया जाता है।