पाटन। राज्य सरकार के द्वारा समर्थन मूल्य पर किसानों का धान की खरीदी शुरू तो कर दी गई है लेकिन किसानों को अपने मेहनत के फसल को बेचने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ रहा है जितनी समस्या किसानों को धान की बोनी से लेकर कटाई तक नहीं हुई उससे ज्यादा समस्या उसे अपने उपज को बेचने के लिए हो रही है। शुरू से लेकर आखिरी तक दिक्कतों का ही सामना करना पड़ रहा है। कई किसान परेशान भी है। सबसे पहले किसानों को तो आसानी से टोकन नहीं मिल रहा है ऑनलाइन एप पर टोकन के लिए जब खोलते हैं तो जैसे खुलता है उसके 1 से 2 मिनट में पूरा लिमिट फुल हो जाता है। इसका यह भी कारण बताया जा रहा है कि धान खरीदी की लिमिट बढ़ाया नहीं गया है। इस कारण से टोकन बहुत जल्दी फुल हो जाता है । किसी भी तरह से टोकन अगर मिल भी जाए तो किसानों को सुबह 5 बजे से अपनी धान को लेकर उपार्जन केंद्र के सामने लाइन लगाने पड़ रही है। सुबह 8 बजे गेट पास एंट्री का ऐप खुलता है । वह भी आज पाटन ब्लॉक के कई समिति में काफी देर से खुली।। आधे घंटे तक प्रयास करने के बाद किसानों की धान का एंट्री शुरू हुआ इससे किसान काफी मायूस नजर आ रहे थे। धान के गाड़ी के सामने पर्ची को लेकर फोटो खींचना किसानों को नागवार गुजर रहा है । यही नहीं किसी भी तरीका से अगर धान की एंट्री हो भी गई तो कंप्यूटर ऑपरेटर दक्ष नहीं है उन्हें भी एंट्री काटने में काफी समय लग रहा है । कुछ किसानों ने तो यह भी बताया कि उनके जितना धान लाए थे कहीं कहीं उनसे काम की एंट्री भी दिया जा रहा है। वही यह भी बताया जा रहा है कि धान बेचने के बाद पेमेंट एवं लिंकिंग में भी कहीं कहीं पर गड़बड़ी बताई जा रही है कंप्यूटर ऑपरेटर नए होने एवं धान खरीदी का दबाव उन पर हमेशा बना हुआ है इस कारण से भी उन्हें ऑपरेटिंग सिस्टम को समझने में समय लग रहा है । समिति तक लाने और बेचने के लिए किसानों को काफी मेहनत करनी पड़ रही है। समितियो में कई किसान आज आक्रोशित नजर आए। शाम होते ही क्लोजिंग करने की हड़बड़ाहट भी ऑपरेटर को रहती है। बताया जा रहा है कि ऑफलाइन 30% टोकन काटना है, आदेश भी जारी हो चुका है लेकिन लिमिट कम होने के कारण ऑफलाइन टोकन नहीं काटे जा रहे हैं। ऑफलाइन टोकन के चक्कर में धान के कोचिया जो है वह भी समितियां में मंडराने लगे हैं। समिति प्रबंधक के पास जो कोचियों का विचरण भी देखा जा सकता है। कुल मिलाकर धन खरीदी तो चल रही है लेकिन किसानों को होने वाले परेशानी से किसी भी को लेना देना नहीं है यही कारण है कि मजबूर किसान जैसे तैसे अपनी धान बेचने के लिए मजबूर हैं।







