31से विराजमान होंगे गणपति बप्पा, अन्तिम आकार ले रही भगवान गणेश की मूर्तियां, मूर्ति के लिए प्रसिद्ध गांव थानौद से अलग अलग राज्यों में जाता है मूर्तियां

दुर्गग्रामीण से राजेन्द्र साहू की रिपोर्ट

दुर्ग । कहते हैं ईश्वर ने यह पूरी प्रकृति, जीव जंतुओं और हम इंसानों को गड़ा है , लेकीन प्रकृति ने इंसानों के बीच कुछ ऐसे भी लोग बनाए हैं , जो ईष्ट ईश्वर को भी गड़ने की क्षमता रखते है और वह हैं मूर्तिकार। जी हां दुर्ग के शिवनाथ नदी के तट पर बसे थानौद गांव के हुनर मंद हाथ कोरोना काल के बाद पुनः मूर्तियों को अन्तिम रूप देने में व्यस्त हैं।

शिवनाथ नदी के तट पर बसा थानौद गांव वैसे तो अन्य गांव की तरफ कृषि पर निर्भर है लेकीन यह गांव एक विशेषता की वजह से पूरे छत्तीसगढ़ अंचल के साथ साथ आसपास के राज्यों में भी अपनी अलग पहचान बनाई है और वह यहां की बनी मूर्तियां। गांव की ही विशेष मिट्टी से निर्मित और अपनी अद्भुत शिल्पकारी से गड़ी गई मुर्तियां , देखने सहसा जीवन्त नजर आती हैं , मानो अब तक वे बोल उठेंगे , यह कमाल है , इस गांव के हुनरमंद हाथों का जो अपनी पुश्तैनी कला को निरंतर आकृति प्रदान कर रहे हैं। अपने पुरखों से , विरासत में मिली इस कला से अब नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने यह साधना निरंतर जारी है। इस गांव के निवासी और मिट्टी को आकृति प्रदान कर मूर्ति बनाने में सिद्धहस्त मूर्तिकार व हजारों लोगों के लिए स्वरोजगार का अवसर पैदा करने वाले, छत्तीसगढ़ शासन के माटी कला बोर्ड के अध्यक्ष बालम चक्रधारी ने बताया कि मूर्ति बनाना वे अपने पुरखों से सीखे हुए हैं और बचपन से ही मूर्तियां बना रहे और अपने 5 भाईयों के साथ साथ अब तक लगभग 800 लोगों को , जिसमें न सिर्फ कुम्हार बल्कि सीखने के इच्छुक हर वर्ग के हजारों लोगों के साथ मूर्तिकला की इस साधना से जोड़ चूके है , जो आज की पीढ़ी के लिए गृह उद्योग के रूप में उनके व उनके लिए परिवार को स्वरोजगार उपल्ब्ध कराने का महत्त्वपूर्ण साधन बन चुका है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी इस प्रतिभा को अवसर प्रदान करते हुए और प्रदेश के उपेक्षित कुम्हारों के हित में उचित कार्ययोजना के क्रियान्वयन के लिए उन्हें माटी कला बोर्ड का अध्यक्ष बनाया है।