ये प्रेरणादायी आपबीती मुंगेली जिला के भाठा भुरका गांव की एक अल्पउम्र विधवा महिला गेंदाबाई की अत्यंत दु:खभरी जीवन की कहानी है। पहले समाज में बाल विवाह प्रथा प्रचलित था। गेंदाबाई (जन्म सन 1963) डिंडौरी निवासी श्री झुमुक लाल सेन की बड़ी बेटी की महज 14 वर्ष की उम्र में भुरका निवासी सेवकराम के साथ हुआ था। बताया जाता है उनकी शादी के समय समाज अशिक्षा, अंधविश्वास और स्वजातीय अंतरकलह के कारण दो भागों में बंटा हुआ था लोग भाई-भाई एक दूसरे के यहां आना-जाना खाना-पीना तो दूर एक दूसरे से बातचीत भी नहीं कर रहे थे, उनका पति सेवकराम शिक्षित समझदार और बहुत ही मिलनसार थे। वे अपने आदर्श सेवाभाव से समाज को एक करने की हर संभव कोशिश करता रहा।उनकी शादी के 2 साल बाद उनकी एक सुंदर, स्वस्थ बेटी(संतोषी)हुई। फिर पति को एक गंभीर बीमारी टी.वी. हो गया। ग़रीबी हालात में इलाज के लिए इधर उधर भटके लेकिन दुर्भाग्यवश पति की मृत्यु हो गई। सेवकराम की समाज सेवा से प्रभावित होकर नाई समाज उसके अंतिम संस्कार दिन ही एक हुए थे। इधर गेंदाबाई 19साल की अल्प उम्र में ही विधवा हो गई। उन पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। बेचारी अबला के सामने कठिन चुनौती थी एक तरफ पूरी जिंदगी पड़ी थी, दूसरी तरफ एक मात्र मासूम सी इकलौती लाडली बेटी की भविष्य की चिंता साथ ही ससुराल की मर्यादा,पतिव्रता धर्म की रक्षा, मां-बाप की इज्जत ये सभी की चिंता। कम उम्र में इतना बड़ा दुख का बोझ खुद को कैसे संभाले कुछ समझ नहीं आ रहा। गेंदाबाई इस घटना को किस्मत का लेख मानकर आंसू पोंछकर नन्ही बेटी के सहारे अपनी विधवा सासु मां के साथ ससुराल में अपनी अधुरी जीवन जी रही थी । लेकिन नियति का खेल देखो। कुछ समय पश्चात उसकी सासू मां की भी मृत्यु हो गई। अब तो उनका का जीवन और भी दुखमय हो गया। इस विकट परिस्थिति में गेंदाबाई भौतिक जीवन का दमन कर अपने आप को भक्तिधारा में जोड़ लिया सन् 1984 में उन्होंने भुरका गांव में महिला मानस मंडली गठन की और भगवान की भजन कीर्तन करते हुए अपनी बेटी की देखभाल करते हुए साध्वी जीवन जीने लगी। इसमें उसे लोगों के ताने, आलोचना, विरोध आदि का सामना करना पड़ा फिर भी वह किसी की बातों का परवाह न करते हुए अपनी एकमात्र सहारा संतोषी बेटी के सहारे जीवन जी रही थी। जब बेटी बड़ी हुई तो उनका विवाह कापादह निवासी प्रहलाद सेन के साथ किया। अब बेटी के ससुराल जाने के बाद अकेली हो गई थी। उनकी बेटी की तीन बेटा और एक बेटी हुई। बेटी-दामाद और बच्चे को खुश देखकर उन्हीं के सहारे जी रही थी कि सन 2020 कोरोना काल में उनकी प्राण आधार बेटी संतोषी की भी बिमारी में इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। अब तो गेंदाबाई की कमर ही टूट गई जिस बेटी के लिए वो अपनी पूरी जिंदगी की दिशा बदली थी उसे भी भगवान उससे छीन लिया। अब बेटी के चारों बच्चे और दामाद की देखभाल करना उनका मजबूरी हो गया था। जिंदा लाश बनकर अपनी बेटी के संतानों और दामाद की सेवा करते हुए गेंदाबाई लगभग 40वर्षों से कठिन परिस्थितियों, असहनीय दुखों का सामना करते करते 03 दिसंबर को 62वर्ष की आयु में देवलोक हो गई। गेंदाबाई के जीवन में आई असहनीय दुख के बावजूद भी भगवान की भक्ति में साध्वी जीवन, धैर्य, आत्मसंयम, सेवा भावना नारी जाति के लिए एक प्रेरणा है। धन्य है वो माता-पिता जो ऐसे आदर्शवादी बेटी को जन्म दिया जो विकट परिस्थिति में भी नारी जाति की मर्यादा कायम रखते हुए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। गेंदाबाई की इस भक्तिमय और साध्वी जीवन से प्रेरित होकर समस्त ग्रामवासी भुरका उसे सबरी माता की उपाधि दिया है। ऐसी महान देवी को शत् शत् नमन।







