छत्तीसगढ़ी संस्कृति , गीत, संगीत ,नृत्य ,तीज त्यौहार का  मंचों पर जीवंत प्रस्तुति देते  रंग झरोखा को हुए 8 साल पूरे, लोक कला साधक दुष्यन्त हरमुख की टीम ने 800 मंचों पर अब तक दे चुकी है प्रस्तुति, पढ़िए पूरी खबर

बलराम यादव
सीजी मितान डेस्क: छत्तीसगढ़ में लोक कला संस्कृति गीत संगीत की बात करते ही बरबस ही लोक कला मंच रंग झरोखा का याद आ जाती है। यह वह संस्था है जिन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक कला मंच को फूहड़ता से दूर रखा। रंग झरोखा की पूरी टीम की मेहनत देखते ही बनती है। छत्तीसगढ़ी माटी की महक और छत्तीसगढ़ी संस्कृति , तीज त्यौहार, कला को लोक संगीत के माध्यम से आज प्रदेश ही नहीं देश के कोने कोने में बिखरा रही है। यही कारण है कि रंग झरोखा के संयोजक प्रसिद्ध बांसुरी वादक दुष्यन्त हरमुख को राज्य सरकार स्व खुमान साव अलंकरण से पुरस्कृत भी किया है। लोक सांस्कृतिक कला मंच रंग झरोखा 24 सितंबर को अपना आठवां स्थापना दिवस मना रहा है। बता दे कि लोक कला साधना का  सफर अभी तय करना शुरू हो किए है इन आठ सालों में  पूरी टीम ने 800 मंचों पर प्रस्तुति दे चुकी है। रंग झरोखा की मुख्य गायिका रिंकी देवांगन, योगिता मढ़रिया की सुरीली आवाज वाकई में गीत संगीत कला साधकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

रंग झरोखा सिर्फ एक लोक कला मंच नहीं है बल्कि रंग झरोखा परिवार छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कला को जन जन तक पहुंचाने का माध्यम है। आधुनिकता की चकाचौंध और पाश्चात्य संगीत का असर नई पीढ़ी पर तेजी से बढ़ती जा रही है। लेकिन रंग झरोखा की प्रस्तुति ने एक बार फिर से छत्तीसगढ़ को अपनी  संस्कृति, मिट्टी की महक और अपने लोक गीत संगीत की तरफ ले जा रही है। यही कारण है कि आज जितने भी आयोजन हुए है उसके हर आयोजनकर्ता के साथ साथ दर्शक भी रंग झरोखा की प्रस्तुति को भूल नहीं पाया है। हर बार एक नए कलेवर के साथ प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध रंग झरोखा की टीम अब अपना कदम बढ़ा रही है। रंग झरोखा का प्रहसन सिर्फ लोगो को हंसाता ही नहीं है बल्कि हमें ऊंच नीच, जात पात , छुआ छूट, अशिक्षा, अंधविश्वास से भी दूर रहने का संदेश देती है। रंग झरोखा के संचालक दुष्यन्त हरमुख बताते है कि कला साधना ही उनके जीवन के एक मात्र लक्ष्य है।

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