सीजी मितान डेस्क
पाटन।।
किसी भी प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी का पहिया यदि सुचारू रूप से घूमता है, तो उसके पीछे राजस्व विभाग की मूक मेहनत होती है। तहसीलदार, नायब तहसीलदार और पटवारी वो धुरी हैं, जिनके इर्द-गिर्द सरकार की हर छोटी-बड़ी योजना घूमती है। लेकिन आज स्थिति यह है कि ‘व्यवस्था की इस रीढ़’ पर इतना बोझ डाल दिया गया है कि वह टूटने की कगार पर है।
‘ऑल इन वन’ कर्मचारी: पहचान का संकट
राजस्व अधिकारियों की मूल नियुक्ति भू-राजस्व संहिता (Land Revenue Code) के पालन, सीमांकन, नामांतरण और बंटवारा जैसे गंभीर कानूनी कार्यों के लिए होती है। लेकिन व्यवहार में स्थिति यह है कि चाहे वह स्वास्थ्य विभाग का सर्वे हो, खाद्य विभाग की जांच हो, परिवहन विभाग का नाका हो या फिर किसी मेले का आयोजन—हर जगह राजस्व अधिकारी को ‘नोडल’ बना दिया जाता है। दूसरे विभागों के काम के फेर में राजस्व न्यायालयों में वर्षों से लंबित प्रकरणों का बोझ बढ़ता जा रहा है, जिससे आम जनता की नजरों में विभाग की छवि ‘धीमी कार्यप्रणाली’ वाली बन जाती है।
प्रोटोकॉल की ‘बेगार’ और आर्थिक दबाव
वीआईपी दौरे और प्रोटोकॉल ड्यूटी आज के समय में राजस्व अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा मानसिक तनाव बन चुके हैं। अचानक मिलने वाले दौरों की सूचना के कारण न केवल पूर्वनिर्धारित पेशियां (Court Hearings) रद्द करनी पड़ती हैं, बल्कि अधिकारियों को घंटों पहले से सड़क किनारे या आयोजन स्थल पर खड़ा रहना पड़ता है।
एक कड़वा सच: इन दौरों पर होने वाले आकस्मिक खर्चों (जैसे नाश्ता, भोजन, वाहन व्यवस्था) के लिए कोई तत्काल सरकारी बजट उपलब्ध नहीं होता। अक्सर अधिकारियों को अपनी सीमित जेब से या अन्य स्रोतों से इनकी व्यवस्था करनी पड़ती है, जो भ्रष्टाचार को अनचाहा बढ़ावा देने या अधिकारी को कर्जदार बनाने का कारण बनता है।

कानून-व्यवस्था:
राजस्व अधिकारी केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि ‘कार्यपालक मजिस्ट्रेट’ भी हैं। कहीं धरना-प्रदर्शन हो, सड़क दुर्घटना हो या सांप्रदायिक तनाव—सबसे पहले राजस्व अधिकारी को मौके पर पहुंचने का आदेश मिलता है। आधी रात को उठकर घटनास्थल पर जाना और उत्तेजित भीड़ को शांत करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन इस जोखिमभरी ड्यूटी के बदले उन्हें न तो कोई अतिरिक्त भत्ता मिलता है और न ही कोई सुरक्षा की ठोस गारंटी।
पारिवारिक विखंडन और स्वास्थ्य की अनदेखी
एक सरकारी कर्मचारी की भी भावनाएं और परिवार होता है। शनिवार-रविवार की छुट्टियां तो राजस्व विभाग के शब्दकोश से गायब हो चुकी हैं। त्योहारों के समय, जब पूरी दुनिया अपने परिवार के साथ होती है, ये अधिकारी कानून-व्यवस्था संभालने या मेलों की ड्यूटी में तैनात रहते हैं। वेतन विसंगति (Low Salary Structure) इतनी गहरी है कि जिम्मेदारी के मुकाबले मिलने वाला मानदेय ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। परिणाम स्वरूप, आज राजस्व अधिकारियों में बीपी, शुगर और क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी बीमारियां आम हो गई हैं।
सुधार के बिना व्यवस्था का पतन निश्चित है
यदि हम चाहते हैं कि प्रदेश का राजस्व प्रशासन पारदर्शी और तेज हो, तो निम्नलिखित बदलाव अनिवार्य हैं:
कार्य का स्पष्ट सीमांकन: राजस्व अधिकारियों को अन्य विभागों के लिपिकीय कार्यों से मुक्त कर केवल राजस्व और मजिस्ट्रेट ड्यूटी तक सीमित रखा जाए।
प्रोटोकॉल के लिए पृथक बजट: वीआईपी दौरों के खर्च के लिए प्रति तहसील एक ‘कंटीन्जेंसी फंड’ बनाया जाए।
मानसिक स्वास्थ्य और अवकाश: रोस्टर प्रणाली लागू हो ताकि हर अधिकारी को महीने में कम से कम दो सप्ताहांत (Weekends) अपने परिवार के साथ बिताने का अनिवार्य मौका मिले।
वेतनमान में सुधार: उनकी जोखिमपूर्ण और बहुआयामी भूमिका को देखते हुए वेतन विसंगतियों को दूर किया जाए।
निष्कर्ष
प्रशासनिक सुधारों की बड़ी-बड़ी बातों के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मशीनरी के पुर्जे अगर घिस जाएंगे, तो पूरी व्यवस्था ठप हो जाएगी। राजस्व अधिकारियों की मांगों और उनकी स्थिति पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की मांग है।






