विकास के लिए राज्यों के पास पैसा नहीं बच रहा ,राज्यों की 80% तक कमाई फ्री स्कीम, वेतन-पेंशन में खर्च

रायपुर । एक दशक से मुफ्त की योजनाएं (फ्री स्कीम) और सब्सिडी राज्यों की सत्ता और राजनीति का बड़ा हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन राज्यों की बिगड़ती वित्तीय सेहत इस तस्वीर का बड़ा सच दिखा रही है। राज्यों के पास विकास, सड़क और आवास के लिए पैसा नहीं बच रहा। उनकी कमाई और खर्च का बड़ा हिस्सा सब्सिडी, वेतन, पेंशन और ब्याज अदायगी जैसे मदों में चला जा रहा है।
राज्यों के कुल खर्च का 20–25% हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में ही खर्च हो रहा है।

छत्तीसगढ़ में आय का 66% फ्री स्कीम और वेतन-भत्तों में खर्च
राज्यों की आय का बड़ा हिस्सा अब विकास की बजाय फ्री स्कीम, वेतन-पेंशन और ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। बजट अनुमानों के अनुसार छत्तीसगढ़ में कुल आय का करीब 66 प्रतिशत इन्हीं मदों में चला जा रहा है। राज्य की कुल कमाई 1.41 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें 32% सब्सिडी व फ्री स्कीम और 34% वेतन-पेंशन व ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। इसके बाद केवल 14.2% राशि ही विकास कार्यों के लिए शेष बचती है।
अन्य राज्यों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। महाराष्ट्र की कमाई 5.63 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें 55.4% वेतन-पेंशन व ब्याज और 11.5% फ्री स्कीम में जा रहा है। मध्यप्रदेश में यह आंकड़ा 43.3%, गुजरात में 45% और बिहार में 41.3% है।
राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में स्थिति ज्यादा गंभीर है। राजस्थान में कर्ज के कारण शेष राशि माइनस 16.7%, हरियाणा में माइनस 30.2% और पंजाब में भारी कर्ज अदायगी के चलते बचत लगभग शून्य हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फ्री स्कीम और कर्ज पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो राज्यों के लिए भविष्य में विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाना और मुश्किल हो जाएगा।


(वित्त वर्ष 2025-26 के बजट अनुमान)
सारे बेहाल: बंगाल पर ब्याज का बोझ शिक्षा के कुल बजट से ज्यादा
बंगाल: कमाई का 21.2% हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जा रहा है। यह शिक्षा-सेक्टर (18.7%) के साझा बजट से ज्यादा है।
राजस्थान: कर्ज के बढ़ते बोझ के कारण स्वास्थ्य बजट पर खर्च स्थिर है।
मध्यप्रदेश: लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के चलते कर्ज और ब्याज का बोझ बढ़ रहा है।
कर्नाटक: गारंटी योजनाएं वित्तीय दबाव बढ़ा रही हैं।
महाराष्ट्र: करीब 903 विकास प्रोजेक्ट मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।
राजस्थान समेत कई राज्य: 45 सरकारी दफ्तरों की सौर-पवन ऊर्जा योजना ठप है क्योंकि सरकार बिजली खरीद समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं कर पा रही है।
विशेष टिप्पणी
मुफ्त की योजनाओं या सब्सिडी की घोषणा करते समय यह देखना जरूरी है कि आय के संसाधन कितने हैं। नई सरकारें अक्सर पुरानी योजनाएं बंद नहीं करतीं ताकि असंतोष न फैले। असम सरकार ने पुरानी योजनाएं खत्म कर वित्तीय बोझ घटाया था। अगर दूसरी सरकारें भी ऐसे कदम उठाएं तो खर्च का दबाव कम हो सकता है।
— अजीत केशरी, वरिष्ठ अर्थशास्त्री