तमिलनाडु का नया ‘नायक’: पहले ही चुनाव में विजय का ‘मास्टर’स्ट्रोक, करुणानिधि-एमजीआर की विरासत को दी चुनौती

सीजी मितान डेस्क।तमिलनाडु की सियासत में नया सुपरस्टार मिल गया है। आठ साल से सुपरहीरो की जो जगह खाली पड़ी थी उसे थलापति विजय भरते हुए दिख रहे हैं। फिल्म स्टार से राज्य की सत्ता तक पहुंचीं जयललिता के  2016 में और 2018 में करुणनिधि के निधन के बाद से ये जगह खाली थी। पिछले 49 साल से राज्य  सियासत में चल रहा द्रविड़ राजनीति का दबदबा खत्म होता दिख रहा है

बीते 49 साल से सिनेमा के सुपरस्टार ही यहां राजनीति के भी ‘नायक’ हुआ करते थे। फिर चाहे बात एम. करुणानिधि की हो या सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर और जे. जयललिता की। इन सभी नामों के अलावा तमिलनाडु की राजनीति में और भी कई ऐसे नाम रहे हैं, जिन्होंने लंबे समय तक इस दक्षिण भारत के राज्य में मजबूत राजनीतिक मौजूदगी दर्ज की है।

एमके स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन भले ही तमिल सिनेमा से वास्ता रखते हैं, लेकिन उन्हें भी कॉलीवुड में पहले के अभिनेताओं जैसी लोकप्रियता नहीं मिली। हालांकि, विजय की बात करें तो उनमें वह सब खूबियां रही हैं, जो उन्हें तमिल सिनेमा का सुपरस्टार बनाती हैं। इसीलिए तमिलनाडु में उन्हें उनके पूरे नाम विजय जोसेफ की जगह ‘थलापति’ विजय के नाम से भी जाना जाता है। थलापति यानी ‘दल का नेतृत्व’ करने वाला। 

तमिलनाडु चुनाव के शुरुआती रुझानों को देखा जाए तो सामने आता है कि टीवीके ने राज्य में एकतरफा तौर पर दोनों स्थापित द्रविड़ पार्टियों- द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के लिए कड़ी चुनौती पेश की है। आलम यह है कि विजय की सीटें इन दोनों पार्टियों से ही ज्यादा हैं। ऐसे में अगर विजय तमिल की राजनीति के अगले ‘मास्टर’ (विजय की एक फिल्म का शीर्षक) साबित हों तो इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं होनी चाहिए। 

कौन हैं विजय जोसेफ?

सी. जोसेफ विजय, जिन्हें जोसेफ विजय चंद्रशेखर के नाम से भी जाना जाता है का जन्म 22 जून 1974 को हुआ था। उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर एक फिल्म निर्माता हैं और उनकी मां शोभा चंद्रशेखर एक हिंदू हैं जो फिल्मों में बैकग्राउंड सिंगर रही हैं। विजय का ताल्लुक तमिलनाडु के वेल्लालर समुदाय से है, जो एक संपन्न कृषि समूह है और इसमें हिंदू व ईसाई दोनों धर्मों के लोग शामिल हैं।

कैसा रहा सिनेमा में आने से लेकर थलापति विजय बनने तक का सफर

सिनेमा की दुनिया में विजय ने 1980 के दशक में अपने पिता द्वारा निर्देशित फिल्मों में एक बाल कलाकार के रूप में कदम रखा था। साल 1992 में उनके माता-पिता ने उन्हें नालैया थीरपू नाम की फिल्म से एक मुख्य अभिनेता के रूप में लॉन्च किया। हालांकि यह पहली फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन उनके करियर का सफर रुका नहीं। इस शुरुआती झटके के बाद, उनके पिता ने उन्हें 1993 की फिल्म सेंथूरपांडी में उस समय के लोकप्रिय स्टार विजयकांत के साथ कास्ट किया, जिसने विजय के फिल्म करियर में नई जान फूंक दी।

साल 1994 में जब विजय 20 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने रसिगन फिल्म की रिलीज के दौरान उन्हें पहली बार ‘इलैयाथलापति’ उपाधि के साथ पेश किया, जिसका मतलब ‘दल का युवा नेता’ होता है। यही नाम आगे चलकर उनके बड़े स्टारडम और अब उनके राजनीतिक सफर की नींव बना है। 

जैसे-जैसे विजय ने तमिल सिनेमा में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया, वैसे-वैसे पूरे राज्य में उनकी चर्चाएं शुरू हो गईं। इसका असर यह हुआ कि विजय कुछ ही समय में उन सितारों की फेहरिस्त में शामिल हो गए, जिनके लिए तमिल सिनेमा के प्रशंसक हमेशा पीछे खड़े दिखते थे। कॉलीवुड में उनकी गिनती उन गिने-चुने स्टार्स में होने लगी, जिनकी फिल्मों की रिलीज से पहले लोग उनके पोस्टरों को दूध से नहलाते थे और फिल्म को हिट कराने के लिए पहले ही दिन से सिनेमा हॉल के बाहर बैठ जाते थे। समकालीन सिनेमा में विजय को सुपरस्टार रजनीकांत का उत्तराधिकारी माना जाता है और उनकी टक्कर में सिर्फ कुछ गिने-चुने अभिनेता ही रखे जाते हैं।