छत्तीसगढ़ के भाट समुदाय के पास सुरक्षित है सैकड़ों परिवारों की वंशावली




    संजय साहू

अंडा।   भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा में जहां पौराणिक और वैदिक काल से राजा-महाराजाओं के साथ बंदी,चारण, जनवरत्न और बुद्धिमान दरबारी की व्यवस्था रहती थी। वहीं कालांतर में राज घरानों और गढों के पतन के साथ ही ऐसे भट्ट एवं गुणिजनों को विरुदावली गायक, भाट व चारण के रुप में अलग-अलग जाति-समुदाय के कुलगुरु और शुभेच्छुओं के रुप में इन्हें अलग ही पहचान मिली है। तब से ये अपनी पुरखौती परंपरा के रुप में अपने यजमानों के घरों में जाकर अपनी जाति अनुशासन के अनुसार निर्धारित ग्रामों में निवासरत जाति के गोत्रों के घरों में साल, दो साल या तीन सालों में भ्रमण कर परिजनों से मंगल कार्यों, शुभकार्यों के लिए ‘सुखदान’ सहित दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए ‘दुखदान’ भी प्राप्त करते हैं। जनजाति शोधार्थी राम कुमार वर्मा ने दुर्ग जिले थनौद, उमदा, बोरीगारका, देवादा, मौहारी- मड़ौदा, अखरा, देवादा, भटगांव, चंदखुरी , बोरसी, दुर्ग, जेवरासिरसा सहित राज्य के कबीरधाम, खैरागढ़, राजनांदगांव, राजिम, रायपुर, बिलासपुर, धमतरी जिले, जालबांधा, गिधवा, कोपेडिह, बिरगांव व पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के सालेकसा के पास के ग्राम पानगांव, बाम्हनी, पठानटोला, दसरथटोला का भ्रमण कर तेली, लोधी, राउत, कुर्मी, केवट, ढ़िमर, कलार, चंद्राकर आदि मूल जाति के भाटों से संवाद कर गोत्र की पोथी व वंशावली लेखन, गोत्र उच्चारण, कवित्त वाचन परंपरा को अपने शोध कार्य का विषय चयन कर गहन संवाद कर बताया कि छत्तीसगढ़ की लगभग सभी जाति-समुदायों के भाटों द्वारा आज भी ‘यजमानी परंपरा’ को अपने रोजगार के रुप में अपना कर रखा गया है।  वो अपने पुरखों कू कार्यों की महत्ता की प्रमाणिता में कहते हैं कि ‘जिनके भाट नहीं, उनकी जात नहीं।’ अर्थात् सभी जातियों के भाट अवश्य होते हैं। वे अपने यजमानों के ग्रामों और परिजनों उनके गोत्रों का उच्चारण लयबद्ध तरीके से करते हैं, जिसमें उनके घर प्रमुखों पूर्वजों, ईष्ट देवी-देवताओं, बुद्धिमान और कुशल सेना नायकों, गढ़ों से जाति उत्पत्ति स्थल, गोत्र उत्पत्ति आदि की कहानी समाहित होती हैं; जो अत्यंत विशिष्टताओं के साथ उनके जाति, कुल गौरव और गोत्र गौरव को बढ़ाने वाली होती है। साथ ही ये अनोखे और दुर्लभ छत्तीसगढ़ी लोक वाद्यों का वादन भी करते हैं, जिसे वे मां सरस्वती के वरदान के रुप में अत्यंत पवित्रता, पूजनीय सामग्री और श्रद्धा के साथ अपने देव घरों में रखने सहित यजमानों के घर ले जाते हैं। इन्हें वे दान देते समय अपनी आसानी के समक्ष पीढ़े पर उचित स्थान देकर गोत्र वाचन कर शारदा, सारंगी, बाना, चिकारा, तमूरा, मंजीरा आदि जैसे पुरखौती और दुर्लभ लोक वाद्यों का वादन करते हैं। इन वाद्यों को उनके पांच से सात पीढ़ियों के पुरखों द्वारा बनाए गए हैं और वे इसे कुशलतापूर्वक बजाते भी थे। इन वाद्यों को आज भी भाटों द्वारा संरक्षित है और इसका कुशलता से वादन करते हैं। फिर इसे अपने आने वाली पीढ़ियां को परंपरा के रुप में हस्तांतरित करने के लिए भी उद्धत हैं। यजमानी परंपरा को ही लूं अपनी खेती मानते हैं। भाट समुदाय के युवा जनों में भी इन वाद्यों के प्रति बेहद ललक है। ताकि वे अपनी पुरखौती यजमानी परंपरा को भी बनाए रख सकें। इनकी गोत्र पोथियों अर्थात् वंशावली को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पारिवारिक वंशावली के रुप में जाति प्रमाण पत्र, निवासी प्रमाण पत्र बनवाने व भूमि बंटवारे आदि के लिए प्रमाणित दस्तावेज के रुप में पहचान देने के लिए भी आकांक्षी हैं‌। इस दिशा में वे छत्तीसगढ़ शासन से निरंतर संपर्क बनाए हुए।