पाटन। ग्राम सेलूद स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट मिडिल स्कूल में करीब 44 लाख रुपये की लागत से भवन निर्माण के बावजूद विद्यार्थियों को शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा नहीं मिल पाना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालात इतने बिगड़े कि दो दिन पहले स्कूली छात्र-छात्राओं को अपनी मांग को लेकर स्टेट हाईवे पर चक्काजाम करना पड़ा। आश्वासन के बाद बच्चे सड़क से वापस लौटे, लेकिन मूल समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब तीन वर्ष पहले जब स्कूल भवन का निर्माण हुआ, तब शौचालय जैसी अनिवार्य सुविधा का प्रावधान आखिर क्यों नहीं किया गया? क्या भवन के प्राक्कलन में शौचालय निर्माण शामिल नहीं था या फिर निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी में चूक हुई? यदि शौचालय का प्रावधान था तो अब तक इसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा, इसकी भी जांच जरूरी है।

चारों तरफ खुला स्कूल परिसर, सुरक्षा भी सवालों के घेरे में

स्कूल भवन के चारों तरफ खुला परिसर है। पीछे बस्ती की गली और बाजू से आम रास्ता है, जहां स्कूल समय में भी लोगों की आवाजाही होती रहती है। स्कूल में चारदीवारी का अभाव भी विद्यार्थियों की सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर सवाल खड़ा करता है। ऐसे में छात्र-छात्राएं शौचालय की जरूरत पूरी करने के लिए आखिर कहां जाएं?
बताया जा रहा है कि पास में ही स्वामी आत्मानंद हायर सेकेंडरी स्कूल संचालित है। परेशानी के समय मिडिल स्कूल के विद्यार्थी वहां के शौचालय का उपयोग करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी जाती। ऐसे में विद्यार्थियों के सामने गंभीर असुविधा की स्थिति निर्मित हो रही है, जिसका सबसे अधिक असर छात्राओं पर पड़ना स्वाभाविक है।
अचानक सड़क पर क्यों उतरे बच्चे?
इस पूरे मामले का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक कुछ पालक हाल ही में स्कूल पहुंचे और बच्चों से चर्चा की। इस दौरान बच्चों ने कथित तौर पर बताया कि एक जनप्रतिनिधि ने उन्हें यह कहा था कि आंदोलन या हड़ताल करने से ही शौचालय की समस्या दूर हो सकती है। हालांकि इस बात की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसकी सत्यता की जांच आवश्यक है।
यदि बच्चों को वास्तव में आंदोलन के लिए प्रेरित किया गया है तो यह भी गंभीर सवाल है कि क्या अपनी मांग रखने के लिए बच्चों को सड़क पर उतारना उचित है? जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार नागरिकों को बच्चों के हाथ में आंदोलन का रास्ता देने के बजाय स्वयं प्रशासन के सामने मजबूती से उनकी समस्या रखनी चाहिए।
भाजपा-कांग्रेस की राजनीति से अलग, बच्चों के मुद्दे पर हो पहल
मामला अब राजनीतिक रंग लेता दिखाई दे रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही आम जनता, किसानों, बेरोजगारों और महिलाओं के मुद्दों पर सड़क की लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब बच्चों को शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के लिए सड़क पर उतरना पड़े, तब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी कहां है?
यह सवाल किसी एक दल के शासन तक सीमित नहीं है। यदि निर्माण के समय से ही यह समस्या मौजूद थी तो पिछली और वर्तमान दोनों व्यवस्थाओं में इसकी अनदेखी कैसे होती रही, इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। बच्चों की समस्या को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय इसका स्थायी समाधान प्राथमिकता होना चाहिए।
क्या यह राजनीतिक स्टंट है या बच्चों की मजबूरी?
चक्काजाम को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बच्चों का सड़क पर उतरना किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था या फिर लंबे समय से चली आ रही परेशानी ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया? इसका जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन एक बात साफ है कि यदि बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़कर सड़क पर बैठने को मजबूर हुए हैं तो यह व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
बच्चों का काम पढ़ाई करना है, अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए आंदोलन करना नहीं। इसलिए प्रशासन को तत्काल स्कूल का निरीक्षण कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि 44 लाख रुपये की लागत वाले भवन में शौचालय का प्रावधान क्यों नहीं हुआ, निर्माण की जिम्मेदारी किसकी थी और वर्तमान में विद्यार्थियों को सुविधा उपलब्ध कराने में देरी क्यों हो रही है।
अब जवाबदेही तय करने का समय
सेलूद के स्वामी आत्मानंद मिडिल स्कूल का मामला सिर्फ एक शौचालय का मुद्दा नहीं, बल्कि सरकारी निर्माण और शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल है। करोड़ों रुपये की योजनाओं और बड़े-बड़े भवनों की चर्चा के बीच यदि बच्चों को एक शौचालय तक उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, तो विकास के दावों की समीक्षा जरूरी है।
अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक रोटी सेंकने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने और बच्चों को तत्काल सुविधा उपलब्ध कराने की है। प्रशासन, जनप्रतिनिधि, पालक और संबंधित विभाग मिलकर यह सुनिश्चित करें कि विद्यार्थियों को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए दोबारा सड़क पर उतरने की नौबत न आए।








