त्रि- दिवसीय रामकथा का शुभारंभ  दीदी माँ मंदाकिनी रामकिंकर के द्वारा दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ

पाटन।  आदर्श मानस मंडल पाहंदा  व श्रीराम किंकर शिष्य सेवा समिति भिलाई, दुर्ग के संयुक्त तत्वावधान में त्रि- दिवसीय रामकथा का शुभारंभ  दीदी माँ मंदाकिनी रामकिंकर के कर कमलों से दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ हुआ।
कथा व्यास से मंदाकिनी रामकिंकर ने कहा- हमारा दायित्व केवल जीवों को जन्म देना नहीं है, उसमें मनुष्यत्व की स्थापना करना भी हमारा कर्तब्य है। नवयुवक, कथा से जुड़ें और सदा के लिए ईश्वर का कृपापात्र बने । युग तुलसी ने जो विलक्षण श्रीराम कथा हमें धरोहर के रूप में दी है उसका हम आदर्श चरित्र निर्माण में सदुपयोग करें।

हनुमत चरित्र’ प्रसंग पर चर्चा करते हुए दीदी मां ने कहा श्री हनुमान जी लंका पहुंच कर श्रीसीताजी से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तब उन्हें कृतकृत्यता का बोध होता है। उन्होंने कृतकृत्यता शब्द का व्याख्या करते हुए कहा। कृत्य माने कर्म और कृत माने कर्म की पूर्णता। अर्थात अब उस साधक को कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। कर्म जीवन की बाध्यता है। भारतीय जीवन दर्शन और पाश्चात्य दर्शन की भिन्नता का प्रतिवादन करते हुए दीदी माँ ने कहा कि भारतीय जीवन दर्शन लाइफ क्वालिटी और लाइफ स्टाइल पर आधारित है। जीवन कैसा है पर नहीं, जीवन क्यों मिला है? इस पर चिन्तन होना चाहिए।

महाराज मनु के पास सभी भौतिक सुख सुविधा थी पर वे सत्य की खोज में निकल पड़े। और अंत में कठिन तपस्या के माध्यम से ईश्वर का साक्षात्कार किया। वे संविधान निर्माता, मनुस्मृति के रचयिता हैं पर एकांतिक चिन्तन ने उन्हें आत्म निरीक्षण के माध्यम से ब्रह्मबोध की ओर प्रेरित किया। उन्हें लगा कि जीवन की चौथी अवस्था में भी विषयों से वैराग्य नहीं हुआ है। जीवन में कृतकृत्यता नहीं आई है।


दीदी माँ ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि पहले अभावों में खुशियाँ थीं पर अब खुशियों में अभाव है। सारे सुख होते हुए भी हम जीवन में बेचैन हैं। आज सुख और विषयों को खोजता हुआ व्यक्ति दुखी है। रावण शांति पाना चाहता था इसलिए श्रीसीता का अपहरण करता है पर क्या उसने कृतकृत्यता का बोध किया? बिना भक्ति की कृपा के कृतकृत्यता का बोध असंभव है।
सीताजी के अन्वेषण में बानर, स्वयंप्रमा पाकर सागर तर पहुंचे। उन्हें घोर निराशा हुई सामने अनुबंधनीय सागर को देखकर, तभी संपाती का संदेश मिला।
दीदी मां ने अंगद के संदेह की व्याख्या करते हुए कहा कि लंका प्रवृति की नगरी है। कंचन, कामिनी, सौदर्य से भरी माया नही नगरी है जहाँ से उबरकर आना असंभव है। अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया- हम सभी माया जाल में मृग की तरह फंसे है।

दीदी माँ ने माताओ से आग्रह किया कि हम सुभद्रा की तरह आधी कथा न सुने । गर्भस्थ शिशु को पूर्ण संस्कार दें। भक्त प्रहलाद को गर्म में संस्कार मिला था।विदुषी मदालसा ने अपने 4 पुत्रों को ब्रह्‌मज्ञानी बनाया ।

जामवंतजी ने हनुमान को जगाया आपका अवतार राम कार्य के लिए हुआ है। हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है। राम काज या काम काज। सारे विघ्नों को पार कर हनुमान जी लंका पहुँचे और माँ का मंगल आशीष प्राप्त कर कृत कृत्य हुए। जीवन का लक्ष्य भक्ति है जिसे प्राप्त करना ही सभी साधकों का कर्तव्य है।
कार्यक्रम का संचालन पीला राम शर्मा ने किया । मौके पर सहदेव शर्मा, नंदलाल साहू अध्यक्ष जिला साहू संघ दुर्ग, नंदलाल देवांगन, मोहन साहू सरपंच, संतोष पांडेय, चैतन देवांगन, राजकुमार देवांगन, राम राजेश साहू, शत्रुहन लाल सोनी, सुरेश सिकारे सहित बड़ी संख्या में श्रोतागण उपस्थित थे।