पंडरिया। दौरी से फसल मिसाई की परंपरा अब कुछ वनांचल क्षेत्रों में रह गई है।मैदानी सहित अनेक वनांचल ग्रामों में भी अब ट्रेक्टर व हार्वेस्टर ने दौरी की जगह ले ली है।फसल मिसाई की आधुनिक तरीकों के आने के साथ पुरानी परंपरा दौरी अब विलुप्त हो रही है।दौरी में करीब 10 बैलों को एक साथ बांधकर फसल के ऊपर चलाया जाता है,जिससे फसल के दाने पौधे से अलग हो जाते हैं।वनांचल के कुछ गांवों में अभी भी यह परंपरा अपनाई जाती है।यह तस्वीर वनांचल ग्राम सेंदुरखार की है,जहां किसान द्वारा कुटकी फसल की मिसाई की जा रही है।वनांचल के अनेक गांवों में दौरी के द्वारा मिसाई कार्य किया जाता है।

वनांचल में कोटो -कुटकी की फसल अधिक लगाई जाती है,जिसमें ट्रेक्टर व हार्वेस्टर से कृषि कार्य काफी महंगा व दुर्लभ होने के कारण लोग दौरी का प्रयोग करते हैं।कृषक राम सिंह ने बताया कि कोदो कुटकी के फसल की मिसाई कार्य दौरी द्वारा किया जाता है।जिसे खाने व बेचने के लिए उगाते हैं।किसानों की प्रति किलोग्राम 30 रुपये की दर से इससे आय प्राप्त होती है।






