अंडा। धर्मारण्य क्षेत्र ग्राम ओटेबंद में श्री विष्णु महाराज मंदिर समिति द्वारा आयोजित 66वें वर्ष के पावन अवसर पर 19 फरवरी से 01 मार्च 2026 तक चल रहे श्रीमद् भागवत कथा एवं यज्ञ कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। 21 फरवरी से प्रारंभ हुई कथा में वृंदावन धाम से पधारे भागवताचार्य पूज्य संत श्री राजीव नयन जी महाराज प्रतिदिन दोपहर 1 बजे से शाम 5 बजे तक अमृतमयी कथा का रसपान करा रहे हैं। भागवत कथा में परीक्षित के रूप में बैठे देवरी निवासी शेरसिंह देशमुख, तेजिया बाई देशमुख बैठे हैं।

कथा के दौरान महाराज श्री ने कहा कि “सत्य परेशान हो सकता है लेकिन परास्त नहीं।” उन्होंने कहा कि सनातन धर्म शाश्वत है—सृष्टि के आदि, मध्य और अंत तक विद्यमान रहेगा। राम और कृष्ण जैसे अवतार इसी सनातन धर्म में हुए हैं। गीता समस्त धर्मग्रंथों की जड़ है और सनातन धर्म सभी धर्मों का पिता तुल्य है।
महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी परिस्थिति में सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। सत्य की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंततः विजय उसी की होती है। भक्ति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति का पात्र विशाल होना चाहिए, क्योंकि प्रभु की कृपा सब पर समान रूप से बरसती है। अंतर केवल पात्रता का होता है। भगवान की कृपा दिखाई नहीं देती, उसे अनुभव किया जाता है—जैसे हवा को देखा नहीं जा सकता, केवल महसूस किया जा सकता है।
वर्तमान राजनीति पर टिप्पणी करते हुए महाराज श्री ने कहा कि राजनीति में धर्म होना चाहिए, लेकिन धर्म में राजनीति नहीं होनी चाहिए। प्राचीन काल में राजा-महाराजा राज्य संचालन से पूर्व गुरुजनों से मार्गदर्शन लेते थे, जिससे शासन व्यवस्था न्यायपूर्ण और धर्मसम्मत रहती थी।
चतुर्थ दिवस की कथा में महाराज श्री ने गजेन्द्र मोक्ष, प्रह्लाद चरित्र, वामन अवतार, रामावतार एवं श्रीकृष्ण जन्म के मार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया। कथा स्थल पर आकर्षक झांकियों ने भक्तों का मन मोह लिया।
पांचवें दिवस की कथा में राजा मोरध्वज की अद्भुत भक्ति का वर्णन किया गया। महाराज श्री ने बताया कि राजा मोरध्वज भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। भगवान ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अर्जुन के साथ ब्राह्मण वेश धारण कर उनके दरबार में आगमन किया। ब्राह्मण ने अपने शेर के लिए राजा के पुत्र का अर्धांग मांग लिया। धर्मसंकट की घड़ी में भी राजा मोरध्वज और उनकी पत्नी ने बिना विचलित हुए अपने पुत्र का बलिदान देने का निर्णय लिया। जब वे स्वयं अपने हाथों से पुत्र का शरीर आरी से काटने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर पुत्र को जीवित कर आशीर्वाद दिया।
महाराज श्री ने कहा कि यह कथा त्याग, श्रद्धा और अटूट विश्वास की मिसाल है। सच्ची भक्ति वही है जिसमें स्वार्थ न हो, केवल समर्पण हो।
इधर यज्ञ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिदिन प्रातः 7 बजे से शाम 5 बजे तक हवन एवं पूजा-अर्चना जारी है। 01 मार्च को दोपहर 3 बजे पूर्णाहुति एवं भंडारा का आयोजन होगा। रात्रिकालीन कार्यक्रम में विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हो रही हैं।
पूरे आयोजन में क्षेत्र के श्रद्धालुओं की सक्रिय भागीदारी देखी जा रही है और वातावरण पूर्णतः भक्तिमय बना हुआ है।






