संजय साहू

अंडा। शैलदेवी महाविद्यालय अंडा दुर्ग में हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग, राष्ट्रीय हिंदी अकादमी दिल्ली, छत्तीसगढ़ मित्र और छत्तीसगढ़ साहित्य एवं संस्कृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में 15 एवं 16 फरवरी 2024 को आयोजित दो–दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ।



द्वितीय दिवस के कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य अतिथि भूपेंद्र कुलदीप, रजिस्टार, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग ने कहा कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसके धड़कनों में संस्कृती और रगों में संस्कार बहते हैं। इस देश के एकमात्र राज्य छत्तीसगढ़ जिसको हम मां कहकर पुकारते हैं। मां हमारे प्रथम गुरु होती है जो जन्म से ही हमें शिक्षा, साहित्य और संस्कृति का ज्ञान कराती है और सही मायने में एक मनुष्य बनने हेतु प्रेत करती है इस विषय के संदर्भ में उन्होंने बहुत सी बातें कहीं और कहां की सफलता का एकमात्र उपाय अध्ययनशीलता है। समन्वयक डॉ. रजनी राय ने अपने स्वागत भाषण में आज के कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रशांत श्रीवास्तव, अधिष्ठाता, छात्र कल्याण, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के कुशल व्यवहार की प्रशंसा करते हुए उनके समय–समय मार्गदर्शन एवं सहयोग देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित एवम् कार्यक्रम की सारगर्भिता को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा, साहित्य और संस्कृति में नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ही यह संगोष्ठी आयोजित की गई। अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस के विशिष्ट अतिथि ने अपने उद्बोधन में कहा की नवाचार एवम् रचनात्मकता के मामले में शैलदेवी महाविद्यालय अन्य महाविद्यालयों से आगे है। विभिन्न परिस्थितियों में इनोवेशन होते रहते हैं। समाज आरंभ में उन नवीन खोजो को स्वीकार नहीं करता परंतु बाद में उसे स्वीकार कर लेता है उन्होंने पीपीटी के माध्यम से बड़े ही सहज और सरल शब्दों में नवाचार को समझाया जिसे शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों में नवाचार की इच्छा जागृत हो। आगे उन्होंने संस्कृति और परंपरा को समझाते हुए कक्षा–कक्ष कार्यक्रम में शिक्षण विधि को रेखांकित करते हुए अनेक नवीन विचारों और माध्यमों जैसे माइंड हैकिंग, डिजिटल लाइब्रेरी, ब्लैडेट लर्निंग, नवाचार शिक्षण पद्धति, मोबाइल तकनीक, भारतीय साहित्य एवं विदेशी भाषा साहित्य में नवाचार आदि को सारगर्भित रूप से अभिव्यक्त किया। वहीं इस संगोष्ठी की मुख्य वक्ता श्रीमती जय वर्मा, हिंदी लेखक एवं कवि, यूनाइटेड किंगडम ने बताया कि वें विगत 43 वर्षों से हिंदी भाषा व साहित्य के उत्थान में कार्यरत हैं। जब 1971 में वह पहली बार इंग्लैंड गई तब से इस क्षेत्र में अनवरत कार्य कर रही है। उस समय की हिंदी भाषा और आज के हिंदी भाषा के प्रभाव में बहुत अंतर दिखाई देता है। आज हिंदी विश्व भाषा है और हमें इस पर गर्व है। आज भारत ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व हिंदी बोल और सुन रहा है। यह हमारे प्राचीन ऋषि–मुनियों की महान योगदान है जो हमें जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं और इस क्षेत्र में अपने काव्य लेखन व बृहद कार्यानुभव को साझा किया। आज के कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. संदीप अवस्थी, प्राध्यापक, भागवत विश्वविद्यालय, अजमेर, राजस्थान ने कहा कि शिक्षा, साहित्य एवं संस्कृति के महत्व को व्यवहार में लाकर ही सही मायनों में नवाचार को अभिव्यक्त किया जा सकता है जिस प्रकार हमारे पूर्वज आदिम काल में भी शिक्षा, साहित्य, संगीत, लोकनृत्य व गीतों से परिचित थे उसी भांति हमें भी अपने प्राचीन संस्कृति व भाषा से सदैव जुड़ाव रखते हुए आज के इस वैज्ञानिक युग में भी उसमें छुपे गूढ़ ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। सभी शोध पत्रों का स्तर बहुत ही अच्छा था उन्होंने सांप, मारवाड़ी, रजवाड़ी के उदाहरण देते हुए गांधी और सरला रानी चौधरी तथा अलका सरावगी की नई किताब का उल्लेख किया जिसमें यह पुस्तक कई तथ्यपरख बातें कहती है। डॉ. हंसा शुक्ला, प्राचार्य, स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय, हुडको भिलाई ने कहा कि शिक्षा, साहित्य एवं संस्कृति में नवाचार कैसे हो? सामान्य जीवन, घर–परिवार, रसोई आदि के माध्यम से भी नवीन व प्राचीन तकनीकों का प्रयोग कर हम नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं वहीं उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातन ज्ञान, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति समाज की नींव है अतः इसे बनाए रखना आवश्यक है। प्रसिद्ध कहानी एवं उपन्यासकार तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अलका सरावगी ने कहा कि इनोवेशन और बदलाव के साथ-साथ हमें अपनी राह और विचारों पर स्थिर रहना चाहिए, संघर्ष होगा पर हमारी विजय हमारी होगी। वहीं इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के 9 सत्रों में देश-विदेश से आए अतिथि एवं वक्ताओं के साथ ही विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शोधार्थिर्यों ने उक्त विषयों पर सारगर्भित अपने विचार रखते हुए 20 से शोध सारांश एवं शोध पत्र प्रस्तुत किए। अध्यक्ष श्री राजन दुबे ने रजिस्ट्रार महोदय की सानिध्यता में सभी गणमान्य अतिथियों को प्रतीक चिन्ह व प्रशस्ति–पत्र भेंटकर उनका अभिवादन किया। साथ ही सभी शोधार्थियों को भी इस संगोष्ठी में शामिल होने के लिए प्रमाण पत्र प्रदान किए। कार्यक्रम के समापन के अवसर पर प्राचार्य, डॉ. के. एन. मिश्रा ने इस विषय के सागर गर्वित को दर्शाते हुए नवाचार के साथ सदाचार को भी महत्वपूर्ण बताया और आमंत्रित सभी अतिथिओं, वक्ताओं एवं शोधार्थिर्यों को धन्यवाद ज्ञापित किया। मंच संचालन जितेश मिश्रा सहा. प्राध्यापक वाणिज्य ने किया।






