रायपुर। यह जानते हुए भी कि आततायी सत्ता जन-जीवन को तहस-नहस कर सकती है तब भी हर युग में सच बोलने वाले लोग पैदा हो ही जाते हैं। कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर में एक जगह जुम्मन शेख की मौसी ( खाला ) अलगू चौधरी से कहती हैं-क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे ? आखिरकार मित्रता और संबंधों से परे अलगू न्याय का साथ देता है।

इधर देश में एक तानाशाह के चलते कुछ समय तक यह जरूर लगने लगा था कि अब कभी कोई कुछ नहीं बोल पाएगा. कोई सच और न्याय के लिए लड़ नहीं पाएगा तब जेन-जी ने हमें यह बताया है कि वे अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना जानते हैं। यह पीढ़ी बिगाड़ की चिंता से परे…बिना भय के ईमान की बात कहने का माद्दा रखती है। जेन-जी के विरोध-प्रदर्शन और बात कहने के तौर-तरीकों पर परम्परागत और थोपी गई राय अलग-थलग हो सकती हैं, लेकिन जेन-जी ने यह तो साबित कर दिया है कि उनके लिए तानाशाह एक कागज के पुर्जे से ज्यादा कुछ नहीं है और वे तानाशाह की ज्यादतियों के आगे झुकने वाले नहीं हैं।

यह बात कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर जसम के राष्ट्रीय सचिव एवं संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने कही.

रायपुर के ग्रीन पैराडाइज स्थित सोसायटी में ‘ प्रेमचंद और युवा…स्वप्न, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी ‘ विषय पर आयोजित एक विचार गोष्ठी में उन्होंने कहा कि आज भी सुविधाओं की चादर तानकर सोने वाला मध्यवर्ग यह कहते हुए मिल जाता है कि आंदोलन करने से क्या होने वाला है, लेकिन काफी पहले प्रेमचंद शायद ऐसे ही वर्ग के लिए कह गए थे कि धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों से हमारे ज़िंदा रहने का सबूत मिलता है। फिलहाल जेन-जी के धरना-प्रदर्शन और अपने आंदोलनों के जरिए यह भी बता ही दिया है कि वे बगैर डर के ज़िंदा रहने का हुनर जानते हैं।
गोष्ठी में शामिल ग्राम बंगोली के किसान साथी नरोत्तम शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद काफी पहले भारतीय किसान और मजदूरों की दुर्दशा को भांप गए थे। आज़ादी के इतने सालों बाद भी किसानों और मजदूरों की स्थिति बदली नहीं है,बल्कि वर्तमान शासनकाल में और भी ख़राब हो गई है। उन्होंने किसान विरोधी सत्ता से डटकर मुकाबला करने का आह्वान किया।
इस मौके पर संस्कृतिकर्मी समीक्षा नायर ने संगठन में जेन-जी की भागीदारी को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने जसम की प्रदेश अध्यक्ष रुपेंद्र तिवारी के आलेख का वाचन भी किया। अपने आलेख में रुपेंद्र तिवारी ने प्रेमचंद पर आयोजित गोष्ठी को वैचारिक एकजुटता और अपने समय के यथार्थ को समझने का अवसर बताया। उन्होंने कहा कि छात्र-युवा आंदोलनों, विशेषकर जेन-ज़ी और अल्फा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी, यह संकेत देती है कि प्रेमचंद की यथार्थवादी और जनपक्षधर दृष्टि आज भी प्रासंगिक है। प्रेमचंद का साहित्य हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, समाज की वास्तविकताओं को पहचानने और अपने समय के प्रति उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देता है। इसलिए प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य का अध्ययन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय सरोकारों को आत्मसात करना भी है।
सुप्रसिद्ध गायिका वर्षा बोपचे ने शिवकुमार पराग के एक गीत-अब हो सकें तो कोई शम्मा जलाइए। इस दौर-ए-सियासत का अंधेरा मिटाइए…की शानदार प्रस्तुति दी। इसके अलावा उन्होंने जसम के वरिष्ठ साथी सिरिल साइमन के गीत को गाकर भी शमां बांधा। जसम से जुड़े मजदूर साथी कवि भागीरथी वर्मा ने भी छात्र और नौजवानों को केंद्र में रखकर अपनी धारदार रचनाओं का पाठ किया। डॉ. पूनम संजू ने प्रेमचंद के गांव लमही में व्यतीत किए गए क्षणों का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद एक सच्चे यथार्थवादी लेखक थे, यहीं कारण है कि अपनी पत्नी के निधन के उपरांत उन्होंने वैधव्य का जीवन व्यतीत करने वाली शिवरानी देवी से विवाह किया था। प्रेमचंद आज के लेखकों की तरह यह सोचकर नहीं लिखते थे कि उन्हें पुरस्कार मिलेगा और रॉयल्टी मिलेगी। यहीं एक वजह है कि उनके पात्र निर्मला, घीसू, सुमन, होरी, धनिया, जुम्मन शेख, अलगू चौधरी, खाला, हामिद आज भी अमर है और हमारी स्मृतियों का हिस्सा है। संस्कृतिकर्मी सीमा कुजूर ने भी गोष्ठी में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब चौतरफा यह लग रहा था कि अंधेरा बढ़ रहा है तब जेन-जी का आंदोलन हमारे लिए हौसले और उम्मीद का उजाला बनकर लौटा है। जेन-जी तक अच्छा साहित्य पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए लेखिका सनियारा ख़ान ने भी प्रेमचंद को प्रत्येक पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी बताया। सनियारा खान ने कहा कि प्रेमचंद केवल मजदूरों और किसानों के लेखक नहीं थे, बल्कि वे युवा पीढ़ी को प्रेरणा देने वाले लेखक भी थे और हमेशा रहेंगे।







