लोगों के  धरना प्रदर्शन समाप्त करवाने वाले तहसीलदारों की आखिर ऐसी क्या मजबूरी, कि वे खुद आंदोलन की राह पर हैं



आइए जानते हैं,  धरने पर मौजूद तहसीलदारों से उनकी समस्याओं, मांगों पर विस्तृत चर्चा कर उनकी पीड़ा को समझने की कोशिश की, तो उनकी बातें सुनकर लगा कि उनकी मांगें यूं ही औपचारिक नहीं हैं, बल्कि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। वे आम जनता के कार्यों को संवेदनशीलता से करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में उन्हें पूरा कर पाने में कठिनाइयां महसूस हो रही हैं।

तहसीलदारों की पीड़ा

हम लोक सेवा में आए हैं ताकि हम आम जनता की समस्याओं, मांगों को गंभीरता से सुनकर, उसका शासन द्वारा जारी निर्देशों, नियमों, अधिनियमों के दायरे में रहकर उसका सकारात्मक समाधान कर सकें। इसके लिए हम 24 घंटे तत्पर रहते हैं। भरसक प्रयास भी करते हैं कि हम किसी को बिना काम के न लौटाएं।

शासन ने राजस्व की बहुत सी सेवाओं को छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी की परिधि में लाकर उसके निराकरण के लिए एक समय सीमा तय कर दी है। शासन और आम जनता की यह हमसे अपेक्षा रहती है कि हम उसके कार्यों को समय सीमा के भीतर पूरा करें। हम शासन के हर आदेशों निर्देशों का अक्षरशः पालन करने प्रतिबद्ध भी हैं, लेकिन संसाधन नहीं होने से कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, यह सिर्फ क्रियान्वयन करने वाले राजस्व अधिकारी ही जान सकते हैं।

संसाधनों की कमी

राजस्व अधिकारियों को शासकीय वाहन और ड्राइवर उपलब्ध नहीं कराए जाने से होने वाली कठिनाइयां – अचानक होने वाली सड़क दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा, धरना आंदोलन, प्रोटोकॉल आदि में तहसीलदार, नायब तहसीलदार बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते हैं। पहुंचते भी हैं तो अपने स्वयं के साधनों का प्रयोग करके। अपने निजी संसाधन का प्रयोग या तो स्वयं वाहन चालक बनकर आते हैं या ड्राइवर की व्यवस्था करके पहुंचते हैं।

मांगें

– आम जनता का काम वे सरलता, सहजता और समय सीमा में करें, इसके लिए उन्हें पर्याप्त संसाधन दें, स्वीकृत सेट अप अनुसार पर्याप्त कर्मचारी दें।
– पर्याप्त संसाधन देने के बाद शासन प्रशासन उनके कार्यों का मूल्यांकन करे और तब अपेक्षा पर खरे न उतरे, तब उन पर अनुशासक कार्यवाही करे।
– तहसीलदार से डिप्टी कलेक्टर में प्रमोशन के लिए पदोन्नति के पदों में 50% की व्यवस्था की जाए।
– नायब तहसीलदारों को राजपत्रित अधिकारी का दर्जा देने, ग्रेड पे में सुधार लाने, शासकीय कार्य हेतु शासकीय तौर पर मोबाइल और मोबाइल नंबर एलॉट करने सहित अन्य विषयों की मांग।

निष्कर्ष

तहसीलदार नायब तहसीलदार अपने रिस्क पर अपने निजी संसाधनों से शासन का समय सीमा में कार्य करते हैं। यदि इनसे कोई चूक हो जाए, तो सीधे थाने में FIR दर्ज करवा दी जाती है या सस्पेंड कर दिया जाता है। अच्छे और संवेदनशील होकर कठिन परिस्थितियों में कार्य करने का कोई हौसला अफजाई नहीं किया जाता। पुरस्कार देने की तो बात ही छोड़ दी जाए। सांत्वना स्वरूप शाबाशी भी नहीं दी जाती।

ऐसे में तहसीलदार नायब तहसीलदारों द्वारा अपनी 17 सूत्रीय मांगों के साथ संसाधन नहीं तो काम नहीं के नारे के साथ आंदोलन की राह पर हैं, तो क्या गलत है? शासन को उनकी जायज मांगों को तत्काल पूरा करने में पीछे क्यों रहना चाहिए? तहसीलदार नायब तहसीलदार अपने लिए कम, आम जनता की सहूलियतों के लिए ज्यादा मांग रहे हैं।