पाटन में मजदूरों का प्रदर्शन, ‘कका अभी जिंदा है’ नारे से गरमाई सियासत, पढ़िए सीजी मितान की त्वरित टिप्पणी

बलराम यादव
पाटन। जनपद पंचायत पाटन के सामने मंगलवार को ग्रामीण मजदूरों की विभिन्न समस्याओं को लेकर आयोजित धरना-प्रदर्शन ने अचानक राजनीतिक रंग ले लिया। शुरुआत में इसे पूरी तरह गैर-राजनीतिक बताने वाले आयोजकों के दावे उस समय कमजोर पड़ते दिखे, जब मंच से “कका अभी जिंदा है” के नारे गूंज उठे—जो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समर्थन से जुड़ा माना जाता है।
जनकल्याण समिति के बैनर तले आयोजित इस रैली में बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूर, महिला-पुरुष और उनके बच्चे शामिल हुए। वक्ताओं ने मजदूरों के हक, रोजगार, मजदूरी दर और ग्रामीण समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद की और कार्यक्रम को गैर-राजनीतिक बताया।
हालांकि, जैसे ही एक पंचायत प्रतिनिधि ने अपने संबोधन में “कका अभी जिंदा है” का नारा लगाया, पंडाल और आसपास मौजूद लोगों के बीच राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गईं। इस नारे को सीधे तौर पर कांग्रेस और विशेष रूप से भूपेश बघेल से जोड़कर देखा जाने लगा।
स्थिति यह रही कि कार्यक्रम में मौजूद कुछ भाजपा समर्थित जनप्रतिनिधि रैली के दौरान पीछे खिसकते नजर आए। इससे यह संकेत भी मिला कि मंच पर भले ही गैर-राजनीतिक होने का दावा किया गया, लेकिन जमीन पर इसकी धारणा अलग बनती जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में “कका अभी जिंदा है” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक संदेश है। ऐसे में इसका इस्तेमाल किसी भी मंच पर होते ही कार्यक्रम की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन मजदूरों के मुद्दों पर केंद्रित रह पाएगा या फिर राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बनकर अपनी मूल दिशा खो देगा। फिलहाल, इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीणों की स्वतःस्फूर्त भागीदारी इस बात का संकेत जरूर देती है कि जमीनी मुद्दे गंभीर हैं—लेकिन उन पर राजनीति हावी होती दिख रही है।