रायपुर। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने प्रागैतिहासिक पुरातत्व के क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं मौलिक शोध कार्य के लिए मोहम्मद ज़ाकिर खान को डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की है। यह शोध कार्य विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की प्रो. दिनेश नंदिनी परिहार के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।

यह शोध हसदेव नदी घाटी की प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक परम्परा का अब तक का सबसे व्यापक एवं वैज्ञानिक अध्ययन है। व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण, स्तरक्रम (Stratigraphy), पाषाण उपकरणों के तकनीकी एवं सांख्यिकीय विश्लेषण, कच्चे पत्थरों के स्रोतों का अध्ययन, प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का दस्तावेजीकरण तथा ऑप्टिकली स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस (OSL) डेटिंग जैसी आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से इस शोध ने छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक इतिहास को नई वैज्ञानिक पहचान प्रदान की है।
इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में हसदेव नदी घाटी में 43 प्रागैतिहासिक पुरास्थलों की खोज एवं वैज्ञानिक अभिलेखन शामिल है। इन स्थलों से निम्न पुरापाषाण, मध्य पुरापाषाण, उत्तर पुरापाषाण तथा सूक्ष्म पाषाण (माइक्रोलिथिक) काल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि हसदेव नदी घाटी हजारों वर्षों तक मानवनिवास, तकनीकी विकास और सांस्कृतिक निरंतरता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रही। इस अध्ययन ने हसदेव घाटी को पूर्वी-मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक परिदृश्यों में स्थापित किया है।
शोध के अंतर्गत 8,238 पाषाण उपकरणों (Lithic Artefacts) का विस्तृत तकनीकी एवं सांख्यिकीय अध्ययन किया गया, जो मध्य भारत के सबसे बड़े व्यवस्थित प्रागैतिहासिक पाषाण उपकरण संग्रहों में से एक है। इस संग्रह में आशुलेयन हैंडऐक्स एवं क्लीवर, मध्य पुरापाषाण की लेवाल्वा तकनीक, उत्तर पुरापाषाण के ब्लेड उद्योग तथा सूक्ष्म पाषाण काल के ज्यामितीय उपकरण शामिल हैं।
अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र में तकनीकी विकास स्थानीय स्तर पर क्रमिक रूप से हुआ तथा यह किसी बाहरी सांस्कृतिक प्रतिस्थापन का परिणाम नहीं था।
शोध की सबसे ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धि यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य में पहली बार प्रागैतिहासिक संस्कृति का वैज्ञानिक काल निर्धारण (OSL Dating) किया गया है। अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) में किए गए OSL विश्लेषण से दो महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तिथियाँ प्राप्त हुईं।
गितारी के उत्तर पुरापाषाण स्तर की आयु लगभग 33,000 वर्ष पूर्व (BP) तथा देवरी के सूक्ष्म पाषाण स्तर की आयु लगभग 15,800 वर्ष पूर्व (BP) निर्धारित की गई। ये छत्तीसगढ़ राज्य से प्राप्त प्रथम वैज्ञानिक OSL तिथियाँ हैं, जिन्होंने पहली बार प्रदेश के प्रागैतिहासिक कालक्रम को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। यह उपलब्धि राज्य के पुरातात्विक इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानी जा रही है।
शोध के दौरान चार प्रागैतिहासिक शैलचित्र स्थलों का भी दस्तावेजीकरण किया गया, जिनमें ज्यामितीय आकृतियाँ, पशु चित्र, मानव आकृतियाँ तथा हस्तचिह्न प्राप्त हुए हैं। ये शैलचित्र उस समय के मानव की प्रतीकात्मक सोच, सामाजिक व्यवहार तथा बौद्धिक विकास के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक पहचान मिली है। मोहम्मद ज़ाकिर खान ने वर्ष 2025 में अपने शोध निष्कर्षों को दो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत किया — ऑस्ट्रेलिया में आयोजित वर्ल्ड आर्कियोलॉजिकल कांग्रेस (World Archaeological Congress) तथा इंडोनेशिया में आयोजित यूआईएसपीपी कांग्रेस (UISPP Congress)। इन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हसदेव नदी घाटी संबंधी शोध की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक पुरातत्व को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह शोध छत्तीसगढ़ की प्रागैतिहासिक पुरातत्व के इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस शोध के माध्यम से 43 प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज, 8,238 पाषाण उपकरणों का वैज्ञानिक विश्लेषण तथा छत्तीसगढ़ की प्रथम वैज्ञानिक प्रागैतिहासिक OSL तिथियाँ (33,000 एवं 15,800 वर्ष पूर्व) स्थापित की गई हैं। यह शोध भारतीय प्रागैतिहासिक पुरातत्व में एक मौलिक योगदान है और भविष्य के शोधकर्ताओं, पुरातत्वविदों एवं विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगा।






